Monday, April 25, 2016

मेरा समाज तो सदियो से नीचे बेठा है।

जय प्रकाश नारायण  ने डा. बाबासाहेब अम्बेकार से मिलने के लिये समय ले लिया। बाबा साहेब ने अपने सचिव से कहा कि जैसे ही जयप्रकाश नारायण मिलने आये तो उन्हें तुरंत मेरे पास भेज देना। कुछ समय बाद जयप्रकाश नारायण बाबासाहेब से मिलने पहुचे तो सचिव ने  उन्हें तुरन्त अंदर भेज दिया।अंदर अध्ययन मैं केवल एक ही कुर्सी थी। जिस पर बैठकर बाबासाहेव डॉ.अम्बेडकर अध्ययन मैं इतने लीन थे की उन्हें किसी व्यक्ति की आहट तक नहीं हुई। दूसरी ओर जयप्रकाश बिना आहट के फर्श पर बैठकर किताब देखने लगे।
जब एक धंटा बीट जाने के बाद भी बाबासाहेव ने फर्श पर बेठे जयप्रकाश पर कोई ध्यान नहीं दिया तो जयप्रकाश गुस्से मैं उठकर बाहर जाने लगे । बाहर जाने के लिये जेसे ही निकले  तो बाहर बेठे सचिव ने जयप्रकाश से पूछा की साहब से आपकी बात हो गयी ।जयप्रकाश सचिव से गुस्से मैं बोले डॉ.अम्बेडकर तो अध्ययन मैं व्यस्त है ।उन्होंने तो मेरी तरफ देखा तक नहीं। सचिव दौरकर बाबासाहेब के पास गया।और बताया की साहेब जयप्रकाश जी आये थे ।कमरे मैं एक धंटा बैठकर गुस्से मैं वापस जा रहे हैं ।
बाबासाहेव ने सचिव से कहा अरे डोरङ्कर जाओ और उन्हें वापस बुलाकर लाओ । जेसे ही जयप्रकाश वापस आये ,तो उन्होंने कमरे मै जाकर  बाबासाहेव से गुस्से मैं कहा की"मैं एक धंटा तक जमींन पर बैठकर अपमान का जहर पीता रहा और जब सहन नहीं हुआ तो उठकर चला गया। इस बात पर बाबासाहेव ने गंभीरतापूर्वक कहा, जयप्रकाश आपको यद् होगा कि,आपने कभी सोचा हे कि वर्षो से हमारे पूर्वज और उनकी पीडिया आपके सामने जमीन पर बेठी रही है ।सही अर्थो मैं तुम्हारी पीड़ा यह नहीं है कि तुम जमींन पर बेठइ रहे ,बल्कि यह कि तुम्हारे सामने जमींन पर बठने बाले दलित शोषित आज कुर्सी पर क्यों बैठने लगे है ।






may name राजकूमार


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